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1084ven Ki Maan/Ratinath Ki Chachi/Maai/Idannamam

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SKU: Set-18 (चार अविस्मरर्णीय उपन्यास) Author: Geetanjali Shree, Mahashweta Devi, Maitreyi Pushpa, Nagarjun
Publisher: Rajkamal Prakashan
Subject: Fiction : Novel
Category: Fiction : Novel

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Description

1084वे की माँ

आजादी से समानता, न्याय और समृद्धि के सपने जुड़े थे । लेकिन सातवें दशक में मोहभंग हुआ और सकी तीव्रतम अभिव्यक्ति नक्सलवादी आन्दोलन में हुई । इस आन्दोलन ने मध्य वर्ग को झकझोर डाला । अभिजात कुल में उत्पन्न व्रती जैसे मेधावी नौजवानों ने इसमें आहुति दी और मुर्दाघर में पड़ी लाश नंबर १०८४ बन गया । उसकी माँ व्रती के जीवित रहते नहीं समझ पाई लेकिन जब समझ आया तब व्रती दुनिया में नहीं था । १०८४वे की माँ महज एक विशिष्ठ कालखंड का दस्तावेज नहीं, विद्रोह की सनातन कथा भी है । यह करुणा ही नहीं, क्रोध का भी जनक है और व्रती जैसे लाखों नौजवानों की प्रेरणा का स्रोत भी । लीक से हटकर लेखन, वंचितों-शोषितों के लिए समाज में सम्मानजनक स्थान के लिए प्रतिबद्ध महाश्वेता देवी की यह सर्वाधिक प्रसिद्धि कृति है । इस उपन्यास को कई भाषाओ में सराहना मिली और अब इस विहाल्कारी उपन्यास पर गोविंद निहलानी की फिल्म भी बन चुकी है ।

लेखक : महाश्वेता देवी

जन्म : 1926, ढाका।

पिता श्री मनीष घटक सुप्रसिद्ध लेखक थे।

शिक्षा : प्रारम्भिक पढ़ाई शान्तिनिकेतन में, फिर कलकत्ता विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम.ए.।

अर्से तक अंग्रेजी का अध्यापन।

कृतियाँ अनेक भाषाओं में अनूदित।

हिन्दी में अनूदित कृतियाँ : चोट्टि मुण्डा और उसका तीर, जंगल के दावेदार, अग्निगर्भ, अक्लांत कौरव, 1084वें की माँ, श्री श्रीगणेश महिमा, टेरोडैक्टिल, दौलति, ग्राम बांग्ला, शालगिरह की पुकार पर, भूख, झाँसी की रानी, आंधारमानिक, उन्तीसवीं धारा का आरोपी, मातृछवि, सच-झूठ, अमृत संचय, जली थी अग्निशिखा, भटकाव, नीलछवि, कवि वन्द्यघटी गाईं का जीवन और मृत्यु, बनिया-बहू, नटी (उपन्यास); पचास कहानियाँ, कृष्णद्वादशी, घहराती घटाएँ, ईंट के ऊपर ईंट, मूर्ति, (कहानी-संग्रह); भारत में बँधुआ मजदूर (विमर्श)।

सम्मान : ‘जंगल के दावेदार’ पुस्तक पर ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’। ‘मैगसेसे अवार्ड’ तथा ‘ज्ञानपीठ  पुरस्कार’ द्वारा सम्मानित।

निधन : 28 जुलाई 2016 (कोलकाता)।

 

रतिनाथ की चाची

हिंदी उपन्यास में लोकोन्मुखी रचनाशीलता की जिस परंपरा की शुरुआत प्रेमचंद ने की थी, उसे पुष्ट करनेवालों में नागार्जुन अग्रणी हैं। रतिनाथ की चाची उनका पहला हिंदी उपन्यास है। सर्वप्रथम इसका प्रकाशन 1948 में हुआ था। इसके बाद उनके कुल बारह उपन्यास आए। सबमें लितों-वंचितों-शोषितों की कथा है। रतिनाथ की चाची जैसे चरित्रों से आरंभ हुई यात्रा में बिसेसरी, उगनी, इंदिरा, चंपा, गरीबदास, लक्ष्मणदास, बलचनमा, भोला जैसे चरित्रा जुड़ते गए। उनके उपन्यास में नारी-चरित्रों को मिली प्रमुखता रतिनाथ की चाची की ही कड़ी है। इसीलिए इस कृति का ऐतिहासिक महत्त्व है। रतिनाथ की चाची विधवा है। देवर से प्रेम के चलते गर्भवती हुई तो मिथिला के पिछड़े सामंती समाज में हलचल मच गई। गर्भपात के बाद तिल-तिल कर वह मरी। यह उपन्यास हिंदी का गौरव है।

लेखक : नागार्जुन

जन्म: सन् 1911 में ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन।

जन्मस्थान: ग्राम तरौनी, जिला दरभंगा (बिहार)। परंपरागत प्राचीन पद्धति से संस्कृत की शिक्षा।

सुविख्यात प्रगतिशील कवि-कथाकार। हिंदी, मैथिली, संस्कृत और बांग्ला में काव्य-रचना। पूरा नाम वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’। मातृभाषा मैथिली में ‘यात्री’ नाम से ही लेखन। शिक्षा-समाप्ति के बाद घुमक्कड़ी का निर्णय। गृहस्थ होकर भी रमते-राम। स्वभाव से आवेगशील, जीवंत और फक्कड़। राजनीति और जनता के मुक्तिसंघर्षों में सक्रिय और रचनात्मक हिस्सेदारी। मैथिली काव्य-संग्रह ‘पत्रहीन नग्न गाछ’ के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान तथा मध्य प्रदेश और बिहार के शिखर सम्मान सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित।

प्रमुख प्रकाशित पुस्तकें: रतिनाथ की चाची, बाबा बटेसरनाथ, दुखमोचन, बलचनमा, वरुण के बेटे, नई पौध आदि (उपन्यास); युगधारा, सतरंगे पंखोंवाली, प्यासी पथराई आँखें, तालाब की मछलियाँ, चंदना, खिचड़ी विप्लव देखा हमने, तुमने कहा था, पुरानी जूतियों का कोरस, हजार-हजार बाँहोंवाली, पका है यह कटहल, अपने खेत में, मैं मिलिटरी का बूढ़ा घोड़ा (कविता-संग्रह); भस्मांकुर, भूमिजा (खंडकाव्य); चित्रा, पत्रहीन नग्न गाछ (हिंदी में भी अनूदित मैथिली कविता-संग्रह); पारो (मैथिली उपन्यास); धर्मलोक शतकम् (संस्कृत काव्य) तथा संस्कृत से कुछ अनूदित कृतियाँ।

 

माई

उत्तर प्रदेश के किसी छोटे शहर की बड़ी-सी ड्योढ़ी में बसे परिवार की कहानी। बाहर हुक्म चलाते रोबीले दादा, अन्दर राज करतीं दादी। दादी के दुलारे और दादा से कतरानेवाले बाबू। साया-सी फिरती, सबकी सुख-सुविधाओं की संचालक माई। कभी-कभी बुआ का अपने पति के साथ पीहर आ जाना। इस परिवार में बड़ी हो रही एक नई पीढ़ी-बड़ी बहन और छोटा भाई। भाई जो अपनी पढ़ाई के दौरान बड़े शहर और वहाँ से विलायत पहुँच जाता है और बहन को ड्योढ़ी के बाहर की दुनिया में निकाल लाता है। बहन और भाई दोनों ही न्यूरोसिस की हद तक माई को चाहते हैं, उसे भी ड्योढ़ी की पकड़ से छुड़ा लेना चाहते हैं। बेहद सादगी से लिखी गई इस कहानी में उभरता है आज़ादी के बाद भी औपनिवेशिक मूल्यों के तहत पनपता मध्यवर्गीय जीवन, उसके दुख-सुख, और सबसे अधिक औरत की ज़िन्दगी। बगैर किसी भी प्रकार की आत्म-दया के। पर शिल्प की यह सादगी भ्रामक सादगी है। इसमें छिपे हैं कचोटते सवाल और पैनी सोच। कहानी तो एक बहाना है बड़ी-बड़ी कहानियों तक ले जाने का। माई में हर बात किसी संकेत से होती है, और हर संकेत के आगे-पीछे भरी-पूरी कहानी का आभास होता है। पर कहानी कही नहीं जाती। मानो बात को पकड़ पाना उसको झुठला देना है, उस पर अपनी नजर थोप देना है। असल में अपने देखे और समझे के प्रति शक को लेकर माई की शुरुआत होती है। माई को मुक्त कराने की धुन में बहन और भाई उसको उसके रूप और सन्दर्भ में देख ही नहीं पाते। उनके लिए-उनकी नई पीढ़ी के सोच के मुताबिक-माई एक बेचारी भर है। वे उसके अन्दर की रज्जो को, उसकी शक्ति को, उसके आदर्शों को-उसकी आग को देख ही नहीं पाते। अब जबकि बहन कुछ-कुछ यह बात समझने लगी है, उसके लिए ज़रूरी हो जाता है कि वह माई की नैरेटर बने।

लेखक : गीतांजलि श्री

गीतांजलि श्री के चार उपन्यास-माई, हमारा शहर उस बरस, तिरोहित, खाली जगह-और चार कहानी-संग्रह-अनुगूँज, वैराग्य, प्रतिनिधि कहानियां, यहाँ हाथी रहते थे-छप चुके हैं । अंग्रेजी में एक शोध ग्रन्थ और अनेक लेख प्रकाशित हुए हैं ।

अंग्रेजी में एक शोध ग्रन्थ और अनेक लेख प्रकाशित हुए है ।

इनकी रचनाओं के अनुवाद भारतीय और यूरोपीय भाषाओँ में हुए हैं ।

गीतांजलि थियेटर के लिए भी लिखती हैं ।

फेलोशिप, रेजिडेन्सी, लेक्चर आदि के लिए देश-विदेश की यात्राएँ करती हैं ।

 

इदनमम

‘‘बऊ (दादी), प्रेम (माँ) और मंदा…तीन पीढ़ियों की यह बेहद सहज कहानी तीनों को समानांतर भी रखती है और एक-दूसरे के विरुद्ध भी। बिना किसी बड़ेबोले वक्तव्य के मैत्रेयी ने गहमागहमी से भरपूर इस कहानी को जिस आयासहीन ढंग से कहा है, उसमें नारी-सुलभ चित्रात्मकता भी है और मुहावरेदार आत्मीयता भी। हिंदी कथा-रचनाओं की सुसंस्कृत सटीक और बेरंगी भाषा के बीच गाँव की इस कहानी को मैत्रेयी ने लोक-कथाओं के स्वाभाविक ढंग से लिख दिया है, मानो मंदा और उसके आसपास के लोग खुद अपनी बात कह रहे हों-अपनी भाष और अपने लहज़े में, बुंदेलखंडी लयात्मकता के साथ…अपने आसपास घरघराते क्रेशरों और ट्रैक्टरों के बीच। ‘‘मिट्टी-पत्थर के ढोकों या उलझी डालियों और खुरदरी छल के आसपास की सावधान छँटाई करके सजीव आकृतियाँ उकेर लेने की अद्भुत निगाह है मैत्रेयी के पास लगभग ‘रेणु’ की याद दिलाती हुई। गहरी संवेदना और भावनात्मक लगाव से लिखी गई यह कहानी बदलते, उभरते, ‘अंचल’ की यातनाओं, हार-जीतों की एक निर्व्याज गवाही है…पठनीय और रोचक।’’ -राजेन्द्र यादव

लेखक : मैत्रयी पुष्पा

न्म : 30 नवम्बर, 1944, अलीगढ़ जि़ले के  सिकुर्रा गाँव में।

आरम्भिक जीवन : जि़ला झाँसी के खिल्ली गाँव में।

शिक्षा : एम.ए. (हिन्दी साहित्य), बुंदेलखंड कॉलेज, झाँसी।

कृतियाँ : चिन्हार, गोमा हँसती है, ललमनियाँ तथा अन्य कहानियाँ, पियरी का सपना, प्रतिनिधि कहानियाँ, समग्र कहानियाँ (कहानी-संग्रह); बेतवा बहती रही, इदन्नमम, चाक, झूला नट, अल्मा कबूतरी, अगनपाखी, विजन, कही ईसुरी फाग, त्रिया हठ, गुनाह-बेगुनाह, फ़रिश्ते निकले (उपन्यास); कस्तूरी कुंडल बसै, गुड़िया भीतर गुड़िया (आत्मकथा); खुली खिड़कियाँ, सुनो मालिक सुनो, चर्चा हमारा, आवाज़, तब्दील निगाहें (स्त्री विमर्श); फाइटर की डायरी (रिपोर्ताज)।

फैसला कहानी पर टेलीफिल्म वसुमती की चिट्ठी।

प्रमुख सम्मान : सार्क लिट्रेरी अवार्ड, ‘द हंगर प्रोजेक्ट’ (पंचायती राज) का सरोजिनी नायडू पुरस्कार, मंगला प्रसाद पारितोषिक, प्रेमचन्द सम्मान, हिन्दी अकादमी का साहित्यकार सम्मान, मध्यप्रदेश साहित्य परिषद का वीरसिंह जूदेव पुरस्कार, कथाक्रम सम्मान, शाश्वती सम्मान एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का महात्मा गांधी सम्मान।

सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन और सामाजिक मुद्दों पर सक्रिय हस्तक्षेप।

सम्पर्क : 104, महागुन मार्फियस, प्लाट नं. ई-4, सेक्टर 50, नोएडा-201303 (उ.प्र.)।

मोबाइल : 09910412680

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