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Anya Se Ananya/Gudia Bhitar Gudiya/Dard Jo Saha Maine

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SKU: Set-37 (जीवन गढ़ती स्त्रियों की आत्मकथांएँ) Author: Aasha Apraad, Maitreyi Pushpa, Prabha Khetan
Subject: Autobiography
Category: Autobiography

197 in stock

Description

अन्या से अनन्या

भारतीय साहित्य की विलक्षण बुद्धिजीवी डॉ. प्रभा खेतान दर्शन, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, विश्व-बाजार और उद्योग-जगत की गहरी जानकार थीं और सबसे बढ़कर—सक्रिय स्त्रीवादी लेखिका। उन्होंने न सिर्फ विश्व के लगभग सारे स्त्रीवादी लेखन का व्यापक अध्ययन किया बल्कि अपने समाज में उपनिवेशित स्त्री के शोषण, मनोविज्ञान, मुक्ति के संघर्ष पर विचारोत्तेजक लेखन भी किया। और उसी क्रम में उन्होंने लिखी यह आत्मकथा—’अन्या से अनन्या’। ‘हंस’ में धारावाहिक रूप से प्रकाशित इस आत्मकथा को जहाँ एक बोल्ड और निर्भीक आत्मस्वीकृति की साहसिक गाथा के रूप में अकुंठ प्रशंसनाएँ मिलीं वहीं बेशर्म और निर्लज्ज स्त्री द्वारा अपने आपको चौराहे पर नंगा करने की कुत्सित बेशर्मी का नाम भी इसे दिया गया…।
महिला उद्योगपति प्रभा खेतान का यही दुस्साहस क्या कम रहा कि वह मारवाड़ी पुरुषों की दुनिया में घुसपैठ करती है। कलकत्ता चैम्बर ऑफ कॉमर्स की अध्यक्ष बनती है। एक के बाद एक उपन्यास और वैचारिक पुस्तकें लिखती है और वही प्रभा खेतान ‘अन्या से अनन्या’ में एक अविवाहित स्त्री, विवाहित डॉक्टर के धुआँधार प्रेम में पागल है। दीवानगी की इस हद को पाठक क्या कहेंगे कि प्रभा डाक्टर सर्राफ के इच्छानुसार गर्भपात कराती है और खुलकर अपने आपको डॉ. सर्राफ की प्रेमिका घोषित करती है। स्वयं एक अत्यन्त सफल, सम्पन्न और दृढ़ संकल्पी महिला परम्परागत ‘रखैल’ का साँचा तोड़ती है क्योंकि वह डॉ. सर्राफ पर आश्रित नहीं है। वह भावनात्मक निर्भरता की खोज में एक असुरक्षित निहायत रूढिग़्रस्त परिवार की युवती है। प्रभा जानती है कि वह व्यक्तिगत रूप से ही असुरक्षित नहीं है बल्कि जिस समाज का हिस्सा है वह भी आर्थिक और राजनैतिक रूप से उतना ही असुरक्षित, उद्वेलित है। तत्कालीन बंगाल का सारा युवा-वर्ग इस असुरक्षा के विरुद्ध संघर्ष में कूद पड़ा और प्रभा अपनी इस असुरक्षा की यातना को निहायत निजी धरातल पर समझना चाह रही है…एक तूफानी प्यार में डूबकर…या एक बुर्जुआ प्यार से मुक्त होने की यातना जीती हुई…।

लेखक : प्रभा खेतान

गुड़िया भीतर गुड़िया

तो यह है मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा का दूसरा भाग। कस्तूरी कुंडल बसै के बाद गुड़िया भीतर गुड़िया। अगर बाज़ार की भाषा में कहें तो मैत्रेयी का एक और धमाका। आत्मकथाएँ प्रायः बेईमानी की अभ्यास- पुस्तिकाएँ लगती हैं क्योंकि कभी सच कहने की हिम्मत नहीं होती तो कभी सच सुनने की। अक्सर लिहाज़ में कुछ बातें छोड़ दी जाती हैं तो कभी उन्हें बचा-बचाकर प्रस्तुत किया जाता है। मैत्रेयी ने इसी तनी रस्सी पर अपने को साधते हुए कुछ सच कहे हैंदृअक्सर लक्ष्मण- रेखाओं को लाँघ जाने का ख़तरा भी उठाया है।
मैत्रेयी ने डॉ. सिद्धार्थ और राजेन्द्र यादव के साथ अपने सम्बन्धों को लगभग आत्महंता बेबाकी के साथ स्वीकार किया है। यहाँ सबसे दिलचस्प और नाटकीय सम्बन्ध हैं पति और मैत्रेयी के बीच, जो पत्नी की सफलताओं पर गर्व और यश को लेकर उल्लसित हैं मगर सम्पर्कों को लेकर ‘मालिक’ की तरह सशंकित।
घर-परिवार के बीच मैत्रेयी ने वह सारा लेखन किया है जिसे साहित्य में बोल्ड, साहसिक और आपत्तिजनक इत्यादि न जाने क्या-क्या कहा जाता है और हिन्दी की बदनाम मगर अनुपेक्षणीय लेखिका के रूप में स्थापित हैं।
गुड़िया भीतर गुड़िया एक स्त्री के अनेक परतीय व्यक्तित्व और एक लेखिका की ऐसी ईमानदार आत्म-स्वीकृतियाँ हैं जिनके साथ होना शायद हर पाठक की मजबूरी है।
हाँ, अब आप सीधे मुलाक़ात कीजिए गुड़िया भीतर गुड़िया यानी साहित्य की अल्मा कबूतरी के साथ।

लेखक : मैत्रेयी पुष्पा

दर्द जो सहा मैंने

‘दर्द जो सहा मैंने…’ आशा आपराद की आत्मकथा है । ‘एक भारतीय मुस्लिम परिवार’ में जन्मी ऐसी स्त्री की गाथा जिसने बचपन से स्वयं को संघर्षो के बीच पाया । संघर्षो से जुजते हुए किस प्रकार आशा ने शिक्षा प्राप्त की, परिवार का पालन-पोषण किया, अपने घर का सपना साकार किया-यह सब इस पुस्तक के शब्द-शब्द में व्यंजित है ।
अपनी माँ से लेखिका को जो कष्ट मिले, उनका विवरण पढ़कर किसी का भी मन विचलित हो सकता है । लेकिन पिता का स्नेह इस तपते रेतीले सफ़र में मरूद्यान की भांति रहा । इस आत्मकथा में आशा आपराद ने जीवन की गहराई में जाकर और भी अनेक रिश्ते-नातों का वर्णन किया है ।
सुख-दुःख, मिलन-बिछोह और आभाव-उपलब्धि के धागों से बुनी एक अविस्मरणीय आत्मकथा हे ‘दर्द जो सहा मैंने…’
‘मनोगत’ में आशा आपराद ने लिखा है : मेरी किताब सिर्फ ‘मेरी’ नहीं, यह तो प्रतिनिधिक स्वरुप की है, ऐसा मैं मानती हूँ । हमारा देश तो स्वतंत्र हुआ लेकिन यहाँ का इंसान ‘गुलामी’ में जी रहा है । अगर यह सच न होता तो आज भी औरतों को, पिछड़े वर्ग को, गरीब वर्ग को अधिकार और न्याय के लिए बरसों तक झगड़ना पड़ता क्या । आज भी स्त्रियों पर अनंत अत्याचार होते हैं । दहेज़ के लिए आज भी कितनों को जलना पड़ता है । बेटी पैदा होने से पहले ही उसे गर्भ में ‘मरने का’ तंत्र विकसित हो गया है । मैं चाहती हूँ, जो स्त्री-पुरुष गुलामी का दर्द, अन्याय सह रहे हैं, शोषित हैं, अत्याचार में झुलस रहे हैं, उन सबको अत्याचार के विरोध में लड़ने की, मुकाबला करने की शक्ति प्राप्त हो, बल प्राप्त हो ।
निश्चित रूप से यह आत्मकथा प्रत्येक पाठक को प्रेरणा प्रदान करेगी ।
मराठी से हिंदी में अनुवाद स्वयं आशा आपराद ने किया है । जो अपने मराठी आस्वाद के चलते एक अदभुत प्रदान करता है ।

लेखक : आशा अपराद

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