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Armeniayi Jan Sanhar : Ottoman Samrajya Ka Kalank

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Author: Ed. Suman Kesari & Mane Mkrtchyan
Pub-Year: 2021
Edition: 1st
Pages: 352p
Publisher: Rajkamal Prakashan
Subject: History
Categories: History, Sociology

99 in stock

Description

2015 में आर्मेनियाई जनसंहार को सौ वर्ष हो गए, हममें से कितनों को इसके बारे में पता है? जबकि सच्चाई यह है कि आर्मेनियाई जनसंहार निर्विवाद रूप से बीसवीं सदी का पहला जनसंहार था ! सच तो यह भी है कि भारत में बहुत से लोग आर्मेनिया नामक देश से भी परिचित नहीं हैं। किन्तु उन्नीसवीं सदी के अन्तिम दशक से लेकर बीसवीं सदी के तीसरे दशक तक निरन्तर सुनियोजित तरीक़े से ऑटोमन साम्राज्य द्वारा आर्मेनियाई मूल के लोगों के संहार को जानना आज इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि आज भी राज्यसत्ताएँ अपनी शक्ति बरकरार रखने के लिए जिन उपायों का प्रयोग करती हैं, उनमें से प्रमुख है अपने देश के किसी भी प्रकार के अल्पसंख्यकों को सारी परेशानियों की जड़ बताकर उनको प्रताड़ित करना। प्रथम विश्वयुद्ध के पहले ऑटोमन साम्राज्य में लगभग 20 लाख आर्मेनियाई रहते थे और उनमें से क़रीब 15 लाख आर्मेनियाई सन् 1915-1923 के बीच मार डाले गए और शेष का बलात् धर्मान्तरण या विस्‍थापन कर दिया गया। तुर्की ने आज तक इस जनसंहार को स्वीकार नहीं किया है।

दरअसल ज़रूरत इस बात की है कि इस जनसंहार की घटना को व्यापक रूप से स्वीकार किया जाए, ताकि आनेवाली पीढ़ियाँ सुलह के रास्ते ढूँढ़ सकें और विश्व-भर के लोग जनसंहार की पनप रहीं स्थितियों के प्रति सचेत हो जाएँ। इस पुस्तक का उद्देश्य यही है।

संपादक : सुमन केशरी

15 जुलाई को मुज़फ़्फ़रपुर, बिहार में जन्मी कवि सुमन केशरी ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से सूरदास पर पीएच.डी. की है तथा भारत सरकार में प्रशासनिक पद पर कार्य करते हुए यूनिवर्सिटी ऑफ़ वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया, पर्थ से एम.बी.ए. किया है।
अध्ययन-अध्यापन में गहरी रुचि के चलते उन्होंने वर्ष 2013 में निदेशक के पद से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने के बाद आई.टी.एम., ग्वालियर में मैनेजमेंट का अध्यापन किया तथा प्रेप से लेकर आठवीं कक्षा तक की ‘सरगम’ व ‘स्वरा’ नाम से हिन्दी पाठ्य-पुस्तकें तैयार कीं।
सुमन केशरी के तीन कविता-संग्रह—याज्ञवल्क्य से बहस, मोनालिसा की आँखें और पिरामिडों की तहों में प्रकाशित हुए हैं। उनकी महाभारत पर आधारित कविताएँ चर्चा का विषय रही हैं। उन्होंने जे.एन.यू. में नामवर सिंह का भी सम्पादन किया है।
कविताओं के समग्र विश्लेषण पर आधारित कविताओं के देस में शीर्षक पुस्तक प्रकाशनाधीन है।
सुमन केशरी कहानियाँ, समीक्षाएँ, निबन्‍ध, यात्रा-वृत्तान्‍त भी लिखती हैं। इन दिनों वे नाटक में क़लम आजमा रही हैं। उनका लघु नाटक करोना काल में शादी वेब मैगज़ीन शब्दांकन में प्रकाशित हुआ है।

संपादक : माने मकर्तच्यान

जन्म : 27 मई, 1990; खासाख़, आर्मेनिया गणराज्य।
शिक्षा : दौलत राम महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय से हिन्दी में स्नातक और स्नातकोत्तर की पढ़ाई। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.फिल., वर्तमान में पीएच.डी. की शोधकर्ता।
भारत को अपना दूसरा घर बना चुकी माने मकर्तच्यान आर्मेनियाई व रूसी से हिन्दी अनुवाद में अपना विशेष स्थान रखती हैं। माने मकर्तच्यान पिछले 11 वर्षों से भारत में अनेक साहित्यिक व सामाजिक गतिविधियों से जुड़ी रही हैं। उनके साहित्यिक और राजनीतिक लेख और अनुवाद अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं और चर्चा में रहे हैं।
भारत के इकलौते ‘आर्मेनियाई सांस्कृतिक केन्द्र’ की स्थापना और संचालन में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। यह केन्द्र भारत और आर्मेनिया के बीच सांस्कृतिक, शैक्षणिक और साहित्यिक सम्बन्‍धों के विकास के लिए प्रतिबद्ध है।
माने मकर्तच्यान एक मानवतावादी हैं। इतिहास में जघन्य नरसंहारों पर उन्होंने गहरा शोध किया है और नरसंहारों के विरुद्ध चेतना जागृत करने में वे लगातार सक्रिय हैं।
ई-मेल : [email protected]

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