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Bhagwan Budh : Jeewan Aur Darshan/Chaitanya Mahaprabhu/Albert Einstein

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SKU: Set-39 (जीवन के अमिट छाप: तीन महत्वपूर्ण जीवनियाँ-2) Author: Amritlal Nagar, Dharmanand Kosambi, Gunakar Muley
Subject: Biography
Category: biography

199 in stock

Description

भगवान बुद्ध : जीवन और दर्शन

इस ग्रन्थ के मूल लेखक धर्मानन्द कोसम्बी पालि भाषा और साहित्य के, प्रकांड पंडित थे। बौद्ध धर्म-सम्बन्धी तमाम मौलिक साहित्य का गहरा अध्ययन करके वे अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति के विद्वान बने। लेकिन उनका सारा प्रयास केवल विद्वत्ता पाने के लिए नहीं था। वे बुद्ध भगवान के अनन्य भक्त थे। इसीलिए उन्होंने जो कुछ पाया, जो कुछ किया और साहित्य-प्रवृत्ति द्वारा जो कुछ पाया, जो कुछ किया और साहित्य-प्रवृत्ति द्वारा जो कुछ दिया, वह सब का सब ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय था।
धर्मानन्द कोसम्बी द्वारा लिखित यह चरित्र शायद पहला ही चरित्र ग्रन्थ है, जो किसी भारतीय व्यक्ति ने मूल पालि बौद्ध ग्रन्थ ‘त्रिपिटिक’ तथा अन्य आधार-ग्रन्थों का चिकित्सापूर्ण दोहन करके, उसी के आधार पर लिखा हो। इस प्राचीन मसाले में भी जितना हिस्सा बुद्धि-ग्राह्य था उतना ही उन्ळोंने लिया। पौराणिक चमत्कार, असंभाव्य वस्तु सब छोड़ दी, और जो कुछ भी लिखा, उसके लिए जगह-जगह मूल प्रमाण भी दिए।
इस तरह बौद्ध-साहित्य में उनके काल की सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक जो कुछ भी जानकारी मिल सकती थी, उससे लाभ उठाकर इस ग्रन्थ में बुुद्ध भगवान के काल की परिस्थिति पर नया प्रकाश डाला गया है।
भगवान बुद्ध के बारे में प्रामाणिक जानकारी देनेवाली महत्त्वपूर्ण कृति।

लेखक : धर्मानन्द कोसम्बी

चैतन्य महाप्रभु

चैतन्य महाप्रभु का आविर्भाव वैष्णव धर्म के विकास में एक चमत्कारी घटना है । एक गहरे आवेश और भावनात्मकता के साथ सारे जनसामान्य तक वैष्णव धर्म को पहुँचाने का काम पहले बंगाल में और बाद में सम्पूर्ण देश में, चैतन्य महाप्रभु ने किया । मधुर भाव की नाम–संकीर्तन पद्धति चैतन्य की देन है । इसी के साथ वैष्णव धर्म ने एक नये युग में प्रवेश किया । प्रस्तुत पुस्तक में पहली बार चैतन्य के व्यक्तित्व के इस योगदान को सम्पूर्णता के साथ उजागर किया गया है ।
लेकिन इस पुस्तक का उद्देश्य मात्र इतना ही नहीं है । विद्वान लेखक ने चैतन्य के व्यक्तित्व को तत्कालीन राजनैतिक परिस्थितियों में भी रख कर देखा है । अपने समय के इतिहास में चैतन्य का व्यक्तित्व एवं चुनौती की तरह उभरा और पराजित हिन्दू जाति को एक नयी आस्था और नये आलोक से संयुक्त करने का काम भी चैतन्य ने किया ।
उपन्यासकार नागर जी की लेखनी से प्रस्तुत चैतन्य की यह जीवनी पढ़ने पर एक उपन्यास का मजा तो देती है, साथ ही वैष्णव धर्म के उदार पथ के विकास में उनका महत्त्वपूर्ण और अद्वितीय योगदान भी सामने लाती है ।

लेखक : अमृतलाल नागर

अल्बर्ट आइन्स्टाइन

विख्यात वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्स्टाइन (1879-1955 ई.) द्वारा प्रतिपादित आपेक्षिता-सिद्धांत को वैज्ञानिक चिंतन की दुनिया में एक क्रन्तिकारी खोज की तरह देखा जाता है । क्वांटम सिद्धांत के आरंभिक विकास में भी उनका बुनियादी योगदान रहा है । इन डॉ सिद्धांतों ने भोतिक विश्व की वास्तविकता को समझने के लिए नये साधन तो प्रस्तुत किए ही हैं, मानव-चिंतन को भी बहुत गहराई से प्रभावित किया है । इन्होने हमें एक नितांत नए अतिसूक्ष्म और अतिविशाल जगत के दर्शन कराए हैं । अब द्रव्य, उर्जा, गति, दिक् और काल के स्वरुप को नए नजरिए से देखा जाने लगा है ।
आपेक्षिता-सिद्धांत से, विशेषज्ञों को छोड़कर, अन्य सामान्य जन बहुत कम परिचित हैं । इसे एक ‘क्लिष्ट’ सिद्धांत माना जाता है । बात सही भी है । भोतिकी और उच्च गणित के अच्छे ज्ञान के बिना इसे पुर्णतः समझना संभव नहीं है । मगर आपेक्षिता और क्वांटम सिद्धांत की बुनियादी अवधराणाओं और मुख्या विचारों को विद्यार्थियों व् समंज्य पाठको के लिए सुलभ शैली में प्रस्तुत किया जा सकता है-इस बात को यह ग्रन्थ प्रमाणित कर देता है । न केवल हमारे साहित्यकारों, इतिहासकारों व् समाजशास्त्रियों को, बल्कि धर्माचार्यों को भी इन सिद्धांतों की मूलभूत धारणाओं और सही निष्कर्षों की जानकारी अवश्य होनी चाहिए । आइन्स्टाइन और उनके समकालीन यूरोप के अन्य अनेक वैज्ञानिकों के जीवन-संघर्ष को जाने बगेर नाजीवाद-फासीवाद की विभीषिका का सही आकलन कतई संभव नहीं है ।
आइन्स्टाइन की जीवन-गाथा को जानना, न सिर्फ विज्ञान के विद्यार्थियों-अध्यापकों के लिए, बल्कि जनसामान्य के लिए भी अत्यावश्यक है । आइन्स्टाइन ने डॉ विश्वयुद्धों की विपदाओं को झेला और अमरीका में उन्हें मैकथिवाद का मुकाबला करना पड़ा । वे विश्व-सरकार के समर्थक थे, वस्तुतः एक विश्व-नागरिक थे । भारत से उन्हें विशेष लगाव था ।
हिंदी माध्यम से आपेक्षिता, क्वांटम सिद्धांत, आइन्स्टाइन की संघर्षमय व् प्रमाणिक जीवन-गाथा और उनके समाज-चिंतन का अध्ययन करने वाले पाठकों के लिए एक अत्यंत उपयोगी, संग्रहणीय ग्रन्थ-विस्तृत ‘संदर्भो व् टिप्पणियों’ तथा महत्तपूर्ण परिशिष्टों सहित ।

लेखक : गुणाकर मुले

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