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Qabze Zaman

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SKU: NewRelease-019 Author: Shamsur Rahman Faruqi
Pub-Year: 2021
Edition: 1st
Pages: 144
Publisher: Rajkamal Prakashan
Subject: Fiction : Novel
Category: Fiction : Novel

99 in stock

Description

यह छोटा-सा उपन्यास उर्दू की क़िस्सागोई की बेहतरीन मिसाल है। इक्कीसवीं, सोलहवीं और अठारहवीं सदियों के अलग-अलग सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक मिज़ाज तथा उनके अपने वक़्तों की बोली-बानी में रचा गया है। जो फ़ारूक़ी साहब इस फ़न के उस्ताद लेखकों में एक हैं। कहानी बयान करने पर उन्हें कमाल हासिल है।

इस उपन्यास की मुख्य विषय-वस्तु यह क़िस्सा है कि दिल्ली का एक सिपाही जिसका घर जयपुर के किसी गाँव में था, अपनी लड़की की शादी के लिए रुपए-पैसे का बन्दोबस्त करके अपने घर को चला लेकिन रास्ते में उसे डाकुओं ने लूट लिया। ख़ाली हाथ जयपुर पहुँच उसने लोगों से सुना कि वहाँ एक दानी तवायफ़ रहती है जो मदद कर सकती है। सिपाही ने उससे तीन सौ रुपए का क़र्ज़ लिया और जाकर अपनी बेटी की शादी की। वापसी में वह क़र्ज़ लौटाने जब उसके पास गया तो पता चला कि तवायफ़ गुज़र चुकी है और पैसे वापस लेने को कोई वारिस भी नहीं है।

यह सोचकर कि मृत आत्मा की क़ब्र पर फ़ातिहा पढ़ता चलूँ, जब पहुँचा तो देखा कि क़ब्र फटी हुई है और उसमें एक दरवाज़ा-सा कहीं जाता दिखाई दे रहा है। वह उसमें अन्दर गया तो वहाँ एक महल में उस तवायफ़ से मिला। उसने पैसे वापस करना चाहा तो यह कहकर कि यह जगह तुम्हारे लिए नहीं है, तवायफ़ ने उसे महल से निकलवा दिया। महल के बाहर एक मैदान था, बाग़ थे। वह वहाँ पर कोई तीन घंटे घूमा और जब बाहर निकला तो देखा कि दुनिया में तीन सौ साल का अरसा बीत चुका है।

यह उपन्यास उसके इन दोनों वक्तों की दुनियाओं की उनके अपने मिज़ाज में दिलचस्प अक्काशी करता है और क्योंकि यह सारा क़िस्सा बयान किया है इक्कीसवीं सदी के एक शख़्स ने तो हमारा यह वक़्त भी इसमें आ गया है। इस तरह इस छोटे से उपन्यास की काया में तीन बड़े ज़मानों को समेट दिया गया है… “मालूम होता है कि अल्लाह ताला अपने किसी शख़्स के लिए लम्बे ज़माने को भी मुख़्तसर कर देता है जबकि वह दूसरों के लिए तवील ही रहता है।’’

 

लेखक : शम्सुर्रहमान फ़ारुक़ी

जन्म : 1935, आज़मगढ़ (उत्तर प्रदेश)।

शिक्षा : 1955 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी में एम.ए.। 1958 से 1994 तक भारतीय डाक सेवा में तथा अन्य पदों पर कार्य।

उर्दू तथा अंग्रेज़ी में 40 से अधिक किताबें प्रकाशित। साहित्येतिहास तथा साहित्यिक सिद्धांत में विशेष  रुचि। हिन्दी में एक उपन्यास ‘कई चाँद थे सरे आस्माँ’ तथा आलोचना-ग्रन्थ ‘उर्दू का आरम्भिक काल’ विशेष रूप से चर्चित। अनेक लेखों के अनुवाद प्रकाशित।

1966 से 2005 तक उर्दू साहित्य को आधुनिक दिशा देनेवाली पत्रिका ‘शबख़ून’ के 299 अंकों का प्रकाशन। इसके माध्यम से अन्य भारतीय भाषाओं, विशेषकर हिन्दी की रचनाओं के उर्दू अनुवादों का प्रकाशन।

अनेक देशी-विदेशी विश्वविद्यालयों में व्याख्यान। साहित्य की लगभग सभी विधाओं में महत्त्वपूर्ण कार्य। 1986 में ‘साहित्य अकादमी सम्मान’ तथा 1996 में मीर तक़ी मीर के काव्य पर विस्तृत आलोचना-ग्रंथ ‘शेर शोर अंगेज़’ के लिए ‘सरस्वती सम्मान’।

निधन : 25 दिसम्बर, 2020

अनुवाद :

डॉ. रिज़वानुल हक़ का जन्म 15 जून 1971 को उत्तर प्रदेश के सीतापुर ज़िले के ग्राम भीरा में हआ। उच्च शिक्षा जे.एन.यू., नई दिल्ली से प्राप्त की।

आपकी प्र‌काशित किताबें हैं—­­­उर्दू फ़िक्शन और सिनेमा 2008 (शोध); बाज़ार में तालिब (कहानी संग्रह); आदमीनामा (नज़ीर अकबराबादी की शाइरी और ज़िन्दगी पर आधारित नाटक); इन्सान निकलते हैं (मीर तक़ी मीर की शाइरी और ज़िन्दगी पर आधारित नाटक); गुरूदेव (टैगोर के शैक्षिक विचारों पर नाटक); ख़ुदकुशीनामा (शीघ्र प्रकाश्य उपन्यास।

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