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Sanskar/Gora/Hindu : Jeene Ka Samriddh Kabaad

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SKU: Set-20 (श्रेष्ठ भारतीय उपन्यास) Author: Bhalchandra Nemade, Ravindranath Thakur, U. R. Ananthamurthy
Subject: Fiction : Novel
Category: Fiction : Novel

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Description

संस्कार

यू. आर. अनंतमूर्ति के इस कन्नड़ उपन्यास को युगांतरकारी उपन्यास माना गया है ! ब्राहमणवाद, अंधविश्वासों और रूढिगत संस्कारों पर अप्रत्यक्ष लेकिन इतनी पैनी चोट की गई है कि उसे सहना सनातन मान्यताओं के समर्थकों के लिए कहीं-कहीं दूभर होने लगता है ! ‘संस्कार’ शब्द से अभिप्राय केवल ब्राहमणवाद की रूढ़ियों से विद्रोह करनेवाले नारणप्पा के डाह-संस्कार से ही नहीं है ! अपने लिए सुरक्षित निवास-स्थान, अग्रहार आदि के ब्राहमणों के विभिन्न संस्कारों पर भी रोशनी डाली गई है-स्वर्णाभूषण और सम्पति-लोलुपता जैसे संस्कारों पर भी ! ब्राहमण-श्रेष्ठ और गुरु प्रनेशाचार्य तथा चंद्री, बल्ली और पद्मावती जैसे अलग और विपरीत दिखाई देनेवाले पात्रों की आभ्यंतरिक उथल-पुथल के सारे संस्कार अपने असली और खरे-खोटेपन समेत हमारे सामने उघड आते हैं ! धर्म क्या है ? धर्म-शास्त्र क्या है ? क्या इनमें निहित आदेशों में मनुष्य की स्वतंत्र सत्ता के हरण की सामर्थ्य है, या होनी चाहिए ? ऐसे अनेक सवालों पर यू. आर. अनंतमूर्ति जैसे सामर्थ्यशील लेखक ने अत्यंत साहसिकता से विचार किया है, और यही वैचारिक निष्ठा इस उपन्यास को विशिष्ट बनाती है !

लेखक : यू आर अनन्तमूर्ति

जन्म : 21 दिसम्बर, 1932 ई– में मिलिगे नामक गाँव, जिला शिमोगा (कर्नाटक) ।
शिक्षा : मैसूर विश्वविद्यालय से अंगे्रजी साहित्य में एम–ए– और बर्मिंघम विश्वविद्यालय (इंग्लैंड) से पी–एच–डी– ।
कन्नड़ के प्रख्यात उपन्यासकार और कथा–लेखक । यदा–कदा कविताओं की भी रचना ।
सन् 1975 में आयोवा विश्वविद्यालय, 1978 में तुफ्त्स विश्वविद्यालय (अमेरिका) में विज़िटिंग प्रोफेसर और 1985 में आयोवा विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय लेखक सम्मेलन में हिस्सेदारी । सन् 1987 से 1991 तक महात्मा गां/ाी विश्वविद्यालय, कोट्टायम के उप–कुलपति और सन् 1980–1992 के बीच मैसूर विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफेसर–पद पर कार्य । नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली के चेयरमैन और साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष–पद पर भी कार्यरत रहे ।
भारतीय ज्ञानपीठ सहित साहित्य, संस्कृति और फिल्म क्षेत्र के अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित । देश–विदेश में आयोजित अनेक साहित्य–सम्मेलनों में व्याख्यान और अनेक संस्थाओं की मानद सदस्यता । अवस्था, संस्कार आदि उपन्यासों पर फिल्मों का निर्माण । अंग्रेजी, रूसी, फ्रेंच, हंगेरियन, हिन्दी, बांग्ला, मलयालम, मराठी, गुजराती आदि भाषाओं में रचनाओं का अनुवाद ।
हिन्दी में अनूदित कृतियाँ : संस्कार, अवस्था, भारतीपुर (उपन्यास)य घटश्राद्ध, आकाश और बिल्ली (कहानी संग्रह) ।
सम्प्रति : चेयरमैन, फिल्म एंड टेलिविज़न इंस्टीट्यूट ।

 

गोरा

भारतीय मनीषा के आधुनिक महानायक रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने ‘गोरा’ की रचना एक शताब्दी पहले की थी और यह उपन्यास भारतीय साहित्य की पिछली पूरी शताब्दी के भीतर मौजूद जीवन-रेखाओं के भीतरी परिदृश्य की सबसे प्रामाणिक पहचान बना रहा। वर्तमान विश्व के तेजी से घूमते चक्र में जब एक बार फिर सभी महाद्वीपों के समाज इस प्राचीन राष्ट्र की ज्ञान-गरिमा, चिन्तन-परम्परा तथा विवेक पर आधारित नव-सृजन-शक्ति की ओर आशा भरी दृष्टि घुमा रहे हैं, तो ‘गोरा’ की ऊर्जस्वी चेतना की प्रासंगिकता नए सिरे से अपनी विश्वसनीयता अर्जित कर रही है। आज हम भारतीय साहित्य की परिकल्पना को लेकर जिस आत्म-संघर्ष से गुजर रहे हें, उसे रवीन्द्रनाथ के विचारों और उनके गोरा के सहारे प्रत्यक्ष करने का प्रयास किया जा सकता है। गोरा की भाषिक संरचना और इसकी सांस्कृतिक चेतना भारतीय साहित्य की अवधारणा के नितान्त अनुकूल हैं। इस उपन्यास में रवीन्द्रनाथ ने पश्चिम बंग की साधु बांग्ला, पूर्वी बांग्ला (वर्तमान बांग्लादेश) की बांगाल-भाषा, लोक में व्यवहृत बांग्ला के विविध रूपों, प्राचीन पारम्परीण शब्दों, सांस्कृतिक शब्दावली, नव-निर्मित शब्दावली आदि का समन्वय करके एक बहुत अर्थगर्भी कथा-भाषा का व्यवहार किया है। भौगोलिक शब्दावली के लोक प्रचलित रूप भी ‘गोरा’ की कथा-भाषा की सम्पत्ति हैं। इसी के साथ रवीन्द्रनाथ ने ‘गोरा’ में अपनी कविता और गीत पंक्तियों तथा बाउल गीतों व लोकगीतों की पंक्तियों का प्रयोग भी किया है। अनुवाद करते समय कथा-भाषा तथा प्रयोगों के इस वैशिष्ट्य को महत्त्व दिया गया है। ‘गोरा’ में कितने ही ऐसे विभिन्न कोटियों के शब्द और प्रयोग हैं, जिनके सांस्कृतिक, भौगोलिक, ऐतिहासिक और लोकजीवन के दैनिक प्रयोगों से जुड़े सन्दर्भों को जाने बिना ‘गोरा’ का मूल पाठ नहीं समझा जा सकता। अनुवाद में इनके प्रयोग के साथ ही पाद-टिप्पणियों में इनकी व्याख्या कर दी गई है। अब तक देशी या विदेशी भाषाओं में ‘गोरा’ के जितने भी अनुवाद हुए हैं, उनमें से किसी में भी यह विशेषता मौजूद नहीं है।…और यह ‘गोरा’ का अब तक का सबसे प्रामाणिक अनुवाद है।

लेखक : रवीन्द्रनाथ ठाकुर

जन्म: 7 मई, 1861 को कोलकाता के जोड़ासाँको ठाकुरबाड़ी। रवीन्द्रनाथ ठाकुर को गुरुदेव के नाम से भी जाना जाता है। वे एकमात्र कवि हैं जिनकी दो रचनाएँ दो देशों का राष्ट्रगान बनीं –  भारत का राष्ट्रगान जन गण मन और बांग्लादेश का राष्ट्रीय गान आमार सोनार बांग्ला गुरुदेव की ही रचनाएँ हैं।

कृतियाँ: गीतांजलि, गीताली, गीतिमाल्य, कथा ओ कहानी, शिशु, शिशु भोलानाथ, कणिका, क्षणिका, खेया आदि प्रमुख हैं।

सम्मान: ‘गीतांजलि’ के लिए उन्हें सन् 1913 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला।

निधन: 7 अगस्त, 1941

 

हिन्दू

‘हिन्दू’ शब्द के असीम और निराकार विस्तार के भीतर समाहित, अपने-अपने ढंग से सामाजिक रुढियों में बदलती उखड़ी-पुखड़ी, जमी-बिखरी वैचारिक धुरियों, सामूहिक आदतों, स्वार्थो और परमार्थो की आपस में उलझी पड़ी अनेक बेड़ियों-रस्सियों, सामाजिक-कौतुबिंक रिश्तों की पुख्तगी और भंगुरता, शोषण और पोषण की एक दुसरे पर चढ़ीं अमृत और विष की बेलें, समाज की अश्मिभूत हायरार्की में साँस लेता-दम तोड़ता जन, और इस सबके उबड़-खाबड़ से रह मनाता समय-मरण-लिप्सा और जिवानावेग की अताल्गामी भंवरों में डूबता-उतराता, अपने घावो को चाटकर ठीक करता, बढ़ता काल… देसी अस्मिता का महाकाव्य यह उपन्यास भारत के जातीय ‘स्व’ का बहुस्तरीय, बहुमुखी, बहुवर्णी उत्खनन है! यह n गौरव के किसी जड़ और आत्ममुग्ध आख्यान का परिपोषण करता है, n ‘अपने’ के नाम पर संस्कृति की रंगों में रेंगती उन दीमकों का तुष्टिकरण, जिन्होंने ‘भारतवर्ष’ को भीतर से खोखला किया है! यह उस विरत इकाई को समग्रता में देखते हुए चलता है जिसे भारतीय संस्कृति कहते हैं! यह समूचा उपन्यास हममें से किसी का भी अपने आप से संवाद हो सकता है- अपने आप से और अपने भीतर बसे यथार्थ और नए यथार्थ का रास्ता खोजते राष्टों से! इसमें अनेक पात्र हैं, लेकिन उपन्यास के केंद्र में वे नहीं, सारा समाज है, वही समग्रता में एक पत्र की तरह व्यव्हार करता है! पात्र बस समाज के सामूहिक आत्म के विराट समुद्र में ऊपर जरा-जरा-सा झाँकती हिम्शिलाए हैं! संवाद भी, पूरा समाज ही करता है, लोग नहीं! एक क्षरशील, फिर भी अडिग समाज भीता गूंजती, और ‘हमें सुन लो’ की प्रार्थना करती जीने की जिद की आर्ट पुकारें! कृषि संस्कृति, ग्राम व्यवस्था और अब, राज्य की आकंठ भ्रष्टाचार में लिप्त नई संरचना-सबका अवलोकन करती हुई यह गाथा-इस सबके अलावा पाठक को अपनी अंतड़ियो में खींचकर समो लेने की क्षमता से समृद्ध एक जादुई पाठ भी है!

लेखक : भालचन्द्र नेमाड़े

महाराष्ट्र के सांगवी, जिला—जलगाँव में 27 मई, 1938 को जन्म। पुणे तथा मुंबई विश्वविद्यालयों से एम.ए. और औरंगाबाद विश्वविद्यालय से पी-एच.डी.। औरंगाबाद, लंदन, गोआ तथा मुंबई विश्वविद्यालयों में अध्यापन। मुंबई विश्वविद्यालय के गुरुदेव टैगोर चेयर ऑफ कम्पॅरेटिव लिटरेचर में प्रोफेसर तथा विभाग प्रमुख। सन् 1998 में अवकाश प्राप्त।

प्रमुख कृतियाँ : उपन्यास : कोसला, बिढ़ार, हूल, जरीला  तथा झूल; काव्य : मेलडी तथा देखणी; आलोचना : साहित्याची भाषा, टीका स्वयंवर, साहित्य संस्कृति आणि जागतिकीकरण, ञ्जह्वद्मड्डह्म्ड्डद्व (साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित); The influence of English on Marathi; Indo-Anglian Writings; Frantz Kafka : A Country Doctor; Nativism : Deshivad अनेक भाषाओं में रचनाओं के अनुवाद।

सम्मान एवं पुरस्कार : बिढ़ार  (उपन्यास)—महाराष्ट्र साहित्य परिषद का ह.ना. आपटे पुरस्कार; झूल  (उपन्यास)—यशवंतराव चव्हाण पुरस्कार; साहित्याची भाषा (आलोचना)—कुरुंदकर पुरस्कार; टीका स्वयंवर (आलोचना)—साहित्य अकादमी पुरस्कार; देखणी (कविता-संग्रह)—कुसुमाग्रज पुरस्कार; समग्र साहित्यिक उपलब्धियों के लिए महाराष्ट्र फाउंडेशन का गौरव पुरस्कार; शिक्षा एवं साहित्यिक योगदान के लिए भारत सरकार द्वारा पद्मश्री सम्मान; कुसुमाग्रज जनस्थान पुरस्कार; एन.टी. रामाराव नेशनल लिटरेरी अवार्ड; बसवराज कट्टिमणि नेशनल अवार्ड, महात्मा फुले समता पुरस्कार; समग्र कृतित्व के लिए 50वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार।

डॉ. गोरख थोरात

महाराष्ट्र के संगमनेर, जिला—अहमदनगर में सन् 1969 को जन्म। पुणे विश्वविद्यालय से एम.ए. तथा पी-एच.डी.।

प्रकाशित कृतियाँ : ‘चित्रा मुद्गल के कथा साहित्य का अनुशीलन’, ‘प्रयोजनमूलक हिंदी’, ‘ऐसा सहारा और कहाँ’;  अनुवाद : भालचन्द्र नेमाड़े के ‘हिन्दू’ व ‘झूल’ (उपन्यास) तथा ‘देखणी’ (कविता-संग्रह) के अलावा कई शैक्षिक पुस्तकों के अनुवाद; सम्प्रति : सर परशुरामभाऊ महाविद्यालय, पुणे (महाराष्ट्र) में एसो. प्रोफेसर (हिंदी) के रूप में कार्यरत।

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