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Sara Aakash/Aapka Bunti/Mitro Marjani

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SKU: Set-19 (जिन्दगी के सच : हिंदी के तीन बेहद पठनीय उपन्यास) Author: Krishna Sobti, Mannu Bhandari, Rajendra Yadav
Publisher: Radhakrishna Prakashan, Rajkamal Prakashan
Subject: Fiction : Novel
Category: Fiction : Novel

181 in stock

Description

सारा आकाश

आज़ाद भारत की युवा-पीढ़ी के वर्तमान की त्रासदी और भविष्य का नक़्शा। आश्वासन तो यह है कि सम्पूर्ण दुनिया और सारा आकाश तुम्हारे सामने खुला है – सिर्फष् तुम्हारे भीतर इसे जीतने और नापने का संकल्प हो – हाथ-पैरों में शक्ति हो… मगर असलियत यह है कि हर पाँव में बेड़ियाँ हैं और हर दरवाजश बंद है। युवा बेचैनी को दिखाई नहीं देता कि किधर जाए और क्या करे। इसी में टूटता है उसका तन, मन और भविष्य का सपना। फिर वह क्या करे – पलायन, आत्महत्या या आत्मसमर्पण ? आजशदी के पचास बरसों ने भी इस नक्शे को बदला नहीं – इस अर्थ में सारा आकाश ऐतिहासिक उपन्यास भी है और समकालीन भी। बेहद पठनीय और हिन्दी के सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यासों में से एक सारा आकाश चालीस संस्करणों में आठ लाख प्रतियों से ऊपर छप चुका है, लगभग सारी भारतीय और प्रमुख विदेशी भाषाओं में अनूदित है। बासु चटर्जी द्वारा बनी फ़िल्म सारा आकाश (हिन्दी) सार्थक कलाफिल्मों की प्रारम्भकर्ता फ़िल्म है।

लेखक : राजेन्द्र यादव

जन्म : 28 अगस्त, 1929, आगरा। शिक्षा : एम.ए. (हिन्दी), 1951, आगरा विश्वविद्यालय।

प्रकाशित पुस्तकें : देवताओं की मूर्तियाँ, खेल-खिलौने, जहाँ लक्ष्मी कैद है, अभिमन्यु की आत्महत्या, छोटे-छोटे ताजमहल, किनारे से किनारे तक, टूटना, ढोल और अपने पार, चौखटे तोड़ते त्रिकोण, वहाँ तक पहुँचने की दौड़, अनदेखे अनजाने पुल, हासिल और अन्य कहानियाँ, श्रेष्ठ कहानियाँ, प्रतिनिधि कहानियाँ (कहानी-संग्रह); सारा आकाश, उखड़े हुए लोग, शह और मात, एक इंच मुस्कान (मन्नू भंडारी के साथ), मंत्र-विद्ध और कुलटा (उपन्यास); आवाज तेरी है (कविता-संग्रह); कहानी : स्वरूप और संवेदना, प्रेमचन्द की विरासत, अठारह उपन्यास, काँटे की बात (बारह खंड), कहानी : अनुभव और अभिव्यक्ति, उपन्यास : स्वरूप और संवेदना (समीक्षा-निबन्ध-विमर्श); वे देवता नहीं हैं, एक दुनिया : समानान्तर, कथा जगत की बागी मुस्लिम औरतें, वक्त है एक ब्रेक का, औरत : उत्तरकथा, पितृसत्ता के नए रूप, पच्चीस बरस : पच्चीस कहानियाँ, मुबारक पहला कदम (सम्पादन); औरों के बहाने (व्यक्ति-चित्र); मुड़-मुडक़े देखता हूँ… (आत्मकथा); राजेन्द्र यादव रचनावली (15 खंड)।

प्रेमचन्द द्वारा स्थापित कथा-मासिक ‘हंस’ के अगस्त, 1986 से 27 अक्टूबर, 2013 तक सम्पादन। चेखव, तुर्गनेव, कामू आदि लेखकों की कई कालजयी कृतियों का अनुवाद।

निधन : 28 अक्टूबर, 2013

 

आपका बंटी

आपका बंटी मन्नू भंडारी के उन बेजोड़ उपन्यासों में है जिनके बिना न बीसवीं शताब्दी के हिन्दी उपन्यास की बात की जा सकती है न स्त्री-विमर्श को सही धरातल पर समझा जा सकता है। तीस वर्ष पहले (1970 में) लिखा गया यह उपन्यास हिन्दी की लोकप्रिय पुस्तकों की पहली पंक्ति में है। दर्जनों संस्करण और अनुवादों का यह सिलसिला आज भी वैसा ही है जैसा धर्मयुग में पहली बार धारावाहिक के रूप से प्रकाशन के दौरान था। बच्चे की निगाहों और घायल होती संवेदना की निगाहों से देखी गई परिवार की यह दुनिया एक भयावह दुस्वप्न बन जाती है। कहना मुश्किल है कि यह कहानी बालक बंटी की है या माँ शकुन की। सभी तो एक-दूसरे में ऐसे उलझे हैं कि एक की त्रासदी सभी की यातना बन जाती है। शकुन के जीवन का सत्य है कि स्त्री की जायजश् महत्त्वाकांक्षा और आत्मनिर्भरता पुरुष के लिए चुनौती है – नतीजे में दाम्पत्य तनाव उसे अलगाव तक ला छोड़ता है। यह शकुन का नहीं, समाज में निरन्तर अपनी जगह बनाती, फैलाती और अपना क़द बढ़ाती ‘नई स्त्री’ का सत्य है। पति-पत्नी के इस द्वन्द्व में यहाँ भी वही सबसे अधिक पीसा जाता है बंटी, जो नितान्त निर्दोष, निरीह और असुरक्षित है। बच्चे की चेतना में बड़ों के इस संसार को कथाकार मन्नू भंडारी ने पहली बार पहचाना था। बाल मनोविज्ञान की गहरी समझ-बूझ के लिए चर्चित, प्रशंसित इस उपन्यास का हर पृष्ठ ही मर्मस्पर्शी और विचारोत्तेजक है। हिन्दी उपन्यास की एक मूल्यवान उपलब्धि के रूप में आपका बंटी एक कालजयी उपन्यास है।

 

लेखक :मन्नू भंडारी

भानपुरा, मध्य प्रदेश में 3 अप्रैल, 1931 को जन्मी मन्नू भंडारी को लेखन-संस्कार पिता श्री सुखसम्पतराय से विरासत में मिले। स्नातकोत्तर के उपरान्त लेखन के

साथ-साथ वर्षों दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस में हिन्दी का अध्यापन। विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन में प्रेमचन्द सृजनपीठ की अध्यक्ष भी रहीं।

‘आपका बंटी’ और ‘महाभोज’ आपकी चर्चित औपन्यासिक कृतियाँ हैं। अन्य उपन्यास हैं ‘एक इंच मुस्कान’ (राजेन्द्र यादव के साथ) तथा ‘स्वामी’। ये सभी उपन्यास ‘सम्पूर्ण उपन्यास’ शीर्षक से एक जिल्द में भी उपलब्ध हैं।

कहानी-संग्रह : एक प्लेट सैलाब, मैं हार गई, तीन निगाहों की एक तस्वीर, यही सच है  तथा सभी कहानियों का समग्र ‘सम्पूर्ण कहानियाँ’; एक कहानी यह भी आपकी आत्मकथ्यात्मक पुस्तक है जिसे आपने अपनी ‘लेखकीय आत्मकथा’ कहा है। महाभोज, बिना दीवारों के घर, उजली नगरी चतुर राजा नाट्य-कृतियाँ तथा बच्चों के लिए पुस्तकों में प्रमुख हैं—आसमाता (उपन्यास), आँखों देखा झूठ, कलवा (कहानी) आदि।

 

मित्रो मरजानी

मित्रो मरजानी’! हिन्दी का एक ऐसा उपन्यास है जो अपने अनूठे कथा-शिल्प के कारण चर्चा में आया। इस उपन्यास को जीवन्त बनाने में ‘मित्रो’ के मुँहजोर और सहजोर चरित्र ने विशिष्ट भूमिका निभाई है। ‘मित्रो मरजानी’ की केन्द्रीय पात्र ‘मित्रो’ अभूतपूर्व है…इसलिए भी कि वह बहुत सहज है। मित्रो की वास्तविकता को कृष्णा सोबती ने इतनी सम्मोहक शैली में चित्रित किया है जिसकी मिशाल हिन्दी उपन्यासों में अन्यत्र देखने को नहीं मिलती और वास्तविकता पूरे उपन्यास में एक ऐसा तिलस्म रचती है जिससे यह अहसास जगता है कि मित्रो कोई असामान्य, मनोविश्लेषणात्मक पात्र नहीं है। हाँ, यह सच है कि हिन्दी उपन्यासों में इससे पहले ‘मित्रो’ जैसा चरित्र नहीं रचा गया। जबकि हिन्दी समाज में मित्रो जैसा चरित्र अतीत में भी था और आज भी है। यह तो कृष्णा सोबती की जादूई क़लम और उनकी संवेदनशीलता का कमाल है कि ‘मित्रो मरजानी’ में ‘मित्रो’ के रूप में समाज की इस स्त्री को दमदार दस्तक देने का अवसर मिला। हिन्दी उपन्यास-जगत में अपनी उपस्थिति का उजास भरनेवाली मित्रो ऐसी पहली नारी पात्र है जिसकी रचना में लेखक को बहुत साहस, निर्ममता और ममता की ज़रूरत पड़ी होगी। ऐसे में अपने उपन्यास के एक चरित्र को ढालने के लिए कृष्णा सोबती को इस पात्र से आत्मीय परिचय और तादात्म स्थापित करना पड़ा हो तो आश्चर्य नहीं!

लेखक : कृष्णा सोबती

भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और सुथरी रचनात्मकता के लिए जानी जाती हैं। कम लिखने को वे अपना परिचय मानती थीं, जिसे स्पष्ट इस तरह किया जा सकता है कि उनका ‘कम लिखना’ दरअसल ‘विशिष्ट’ लिखना था।

किसी युग में किसी भी भाषा में एक-दो लेखक ही ऐसे होते हैं जिनकी रचनाएँ साहित्य और समाज में घटना की तरह प्रकट होती हैं और अपनी भावात्मक ऊर्जा और कलात्मक उत्तेजना के लिए एक प्रबुद्ध पाठक वर्ग को लगातार आश्वस्त करती हैं।

कृष्णा सोबती ने अपनी लम्बी साहित्यिक यात्रा में हर नई कृति के साथ अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया है। ‘निकष’ में विशेष कृति के रूप में प्रकाशित ‘डार से बिछुड़ी’ से लेकर ‘मित्रो मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरजमुखी अँधेरे के’, ‘जि़न्दगीनामा’, ‘ऐ लडक़ी’, ‘दिलो-दानिश’, ‘गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान’, ‘चन्ना’, ‘हम हशमत’, ‘समय सरगम’, ‘शब्दों के आलोक में’, ‘जैनी मेहरबान सिंह’, ‘सोबती-वैद संवाद’, ‘लद्दाख : बुद्ध का कमण्डल’, ‘मुक्तिबोध : एक व्यक्तित्व सही की तलाश में’, ‘लेखक का जनतंत्र’ और ‘मार्फत दिल्ली’ तक उनकी रचनात्मकता ने जो बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, सामाजिक और नैतिक बहसें साहित्य-संसार में पैदा कीं, उनकी अनुगूँज पाठकों में बराबर बनी रही है।

कृष्णा सोबती ने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी है। उनके भाषा-संस्कार के घनत्व, जीवन्त प्रांजलता और सम्प्रेषण ने हमारे समय के अनेक पेचीदा सच आलोकित किए हैं। उनके रचना-संसार की गहरी सघन ऐन्द्रियता, तराश और लेखकीय अस्मिता ने एक बड़े पाठक वर्ग को अपनी ओर आकृष्ट किया है। निश्चय ही कृष्णा सोबती ने हिन्दी के आधुनिक लेखन के प्रति पाठकों में एक नया भरोसा पैदा किया। अपने समकालीनों और आगे की पीढिय़ों को मानवीय स्वातंत्र्य और नैतिक उन्मुक्तता के लिए प्रभावित और प्रेरित किया।

‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’, ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ और साहित्य अकादेमी की महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में अपने को साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं। समय को लाँघ जानेवाला लेखन ऐसे लेखन से कहीं अधिक बड़ा होना चाहिए—साहित्य को जीने और समझनेवाले हर आस्थावान व्यक्ति की तरह यह निर्मल और निर्मम सत्य उनके सामने हमेशा उजागर रहा।

निधन : 25 जनवरी, 2019

 

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